Thursday, 20 November 2014

                                                कुचलते सपने

मून मून क्या कर रही हो ?जल्दी से जलावन के लिये लकड़ियाँ चुन के ले आ.बहुत देर हो गयी है. आज घर में कुछ बनेगा भी कि नहीं . परेशान आवाज में मून मून की माँ मून मून को आवाज़ लगा रही थी .मूनमून ग्यारह साल की बच्ची थी.वह दरवाजे पर खेल रही थी.माँ के ये आवाज़ सुनते हीं वो मन मसौस कर जलावन चुनने निकल पड़ी. जिस रास्ते से मून मून जलावन चुनने जाती थी,वही रास्ता एक सरकारी विद्यालय की तरफ भी जाता था.मून मून रोज़ बहुत सारे बच्चों को विद्यालय जाते देखती थी.उसका भी मन उन बच्चों को विद्यालय जाते देख विद्यालय जाने को करता था.वह कई बार अपनी माँ से ये पूछा भी करती थी कि वह स्कुल क्यों नहीं जाती.माँ का हमेशा एक ही जवाब होता ,अगर तुम स्कुल जाओगी तो खाना बनाने के लिये जलावन कौन लाएगा ,घर के और घरेलू काम कौन करेगा .पढने लिखने से घर थोड़े न चलता है,
                                                           मून मून की तरह ऐसी कितनी हीं बच्चे शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते.भारत जैसे लोकतांत्रिक और बड़े देश के लिये ये शर्म की बात है कि 3 मिलियन बच्चे रोड पर रहने को मजबूर हैं .150 मिलियन से अधिक बच्चे किसी न किसी तरीके से बाल मजदूरी का शिकार हैं.इतना हिं नहीं ,हर छह लड़कियों में से एक अपना पन्द्रहवां जन्मदिन कभी नहीं मना पाती.ये कितना हास्यप्रद है कि बाल शिक्षा के राष्ट्रीय नीति होने के बावजूद देश में केवल पचास प्रतिशत बच्चे हीं शिक्षा ग्रहण कर पाते हैं.हम सशक्त भारत का सपना देखते हैं,लेकिन ये कैसे मुमकिन है कि देश के बच्चे को इतने बड़े पैमाने पर शिक्षा से वंचित रखकर हम ये सपना देखें.नेता से लेकर आमलोग ये कहते मिल जाते हैं कि"बच्चे देश का भविष्य हैं" ये कैसे देश का भविष्य बनायेंगे ,जब इनका ही कोई भविष्य नहीं है.
                                                                      सरकारी आंकड़ों के हिसाब से सितम्बर 2004 तक छह से चौदह आयु वर्ग के 193 मिलियन बच्चे इस देश में रहते थे,जिनमें से 8.1 मिलियन बच्चे का किसी भी स्कुल में नाम नहीं था.ये तो रही प्राइमरी स्कुल की बात अगर छोड़ दि जाए,तो 193 मिलियन बच्चों में से केवल 30.5 बिलियन बच्चे हीं आगे की पढाई कर पाते हैं.आखिर इतने सारे बच्चे आज भी सरकार द्वारा हो रही  तमाम घोषणाओं के बाद क्यों नहीं पढ़ पाते,वो भी ऐसे देश में जहाँ 6 से 14 साल के बच्चों के लिये मुफ्त शिक्षा अनिवार्य है.मुफ्त शिक्षा के साथ साथ मध्यान भोजन भी मुफ्त दिया जाता है.पर बात वहीँ पर आकर रुक जाती है कि मुफ्त चीजों की गुणवत्ता भी मुफ्त हीं होती है."कुछ भी फ्री में नहीं मिलता "ये कहावत इन योजनाओं को चरितार्थ करती है.खैर हम आगे के पैराग्राफ में ये जांच परताल करेंगे कि आखिर शिक्षा की इस बदहाली की   बेसिक वजहें क्या है
 रोतो,कपड़ा और मकान हमारी मुलभुत आवश्यकता है और हमेशा रहेगा.इसके आभाव में आदमी न एक कदम चल सकता है न ही कोई क्रांतिकारी विचारों का सृजन कर सकता है.देश की बहुसंख्यक आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहकर अपना जीवन यापन कर रही है.रोटी ,कपड़ा और मकान की आवश्यकता पूर्ण होने के बाद इंसान की पहली आवश्यकता शिक्षा हीं होती है.परन्तु अगर मनुष्य उन्हीं तीन मुलभुत आवश्यकता में सिमटा रहेगा तो शिक्षा के बारे में कैसे सोच सकेगा.सरकार को सबसे पहले लोगों की जीवन शैली को ऊँचा उठाना होगा,जरूरतमंद लोगों को मुलभुत अवश्यकता को पूरा करना होगा  ,तभी लोग अपने बच्चे को स्कुल भेजने का साहस जूटा पाएंगे.अगर ये अचानक से नहीं हो सकता तो सरकार को स्कूली शिक्षण व्यवस्था से लेकर स्कुल के माध्यान भोजन को दुरुस्त करना होगा .
                                                        अब चर्चा करते हैं,स्कूली शिक्षण व्यवस्था कि जो शायद हीं किसी से छुपी हुई है.आज भी अगर कोई आरामतलब नौकरी है तो वो सरकारी स्कुल के शिक्षक की है.शिक्षक होते हैं तो बच्चे नदारद ,बच्चे होते हैं तो शिक्षक नदारद .बेशक आज के दौड़ में इस तरह की तस्वीर को बदलने का सरकार ने पूरा प्रयास किया है,जो कि कहीं न कहीं अधूरा है.सरकारी स्कूलों में शिक्षा मित्रों की धांधली पूर्वक नियुक्ति ने भारतीय शिक्षण व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल खड़ा किया है.कई  अयोग्य शिक्षक आनन फानन में भर्ती कर लिये गये हैं जो अंततः बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ ही करेंगे .सरकारी स्कुल की इन्हीं लचर व्यवस्था की वजह से समाज का तथाकथित संभ्रांत परिवार अपने बच्चे को कभी भी यहाँ नहीं पढ़ना चाहता.संभ्रांत परिवार तो दूर की बात है,खुद सरकारी शिक्षक भी अपने बच्चों को अपने ही विद्यालय में पढ़ने से कतराते हैं.इस मामले में शहरों की सरकारी स्कूलों की हालत तो कुछ जगह ठीक है.लेकिन गाँवों और दूर दराज़ के इलाकों में स्तिथी काफी दयनीय है.
                      दूसरी दयनीय अवस्था है स्कूलों में दिए जाने वाले मिड-डे मील की .आये दिन अखबारों में मिड -डे मील से बच्चों के अस्वस्थ होने और मौत होने की खबर आती रहती है.हाल ही में बिहार में मिड -डे मील खाकर लगभग 22 बच्चों की मौत हो गयी थी.स्कुल से जुड़े शिक्षक ,अधिकारी सभी घटिया सामग्री का उपयोग बच्चो के खाने के लिये करते हैं ,जिनसे बच्चे असमय काल के गाल में समां जाते हैं.इस लापरवाही के चलते हजारों गरीब अपने बच्चों को स्कुल भेजने से कतराते हैं,उन्हें लगता हैं कहीं उनकी संतान भी मिड डे मील खाकर किसी अनहोनी घटना का शिकार न हो जाये.बच्चों को दी जाने वाले खाने की गुणवत्ता बेहद ही घटिया होती है.ऐसे में खाने खाने के लालच में ही सही ,परन्तु पढाई करने को बाध्य बच्चे भी,स्कुल जाने से कतराने लगे हैं.
वहीँ इस सम्बन्ध में जे एन यू में समाजशास्त्र से शोध कर रहे संजय कुमार से बातचीत करने पर पता चला कि शिक्षा को लेकर समाज में अभी पर्याप्त जागरूकता नहीं आयी है.उन्होंने कहा कि बच्चे अच्छी शिक्षा ग्रहण कर सके ,इसकी पूरा उत्तरदायित्व माँ -बाप पर होता है.संजय कुमार ने कहा कि शिक्षा की हालत गाँवों में बेहद दयनीय है.बच्चे खासकर लड़कियां वहां ऊँच शिक्षा लेने से पहले ही स्कुल से नाम कटवा लेती है.या तो कम हीं उम्र में उसकी शादी करवा दी जाती है या तो उसे घर के कामों में लगा दिया जाता है.समाज में स्त्रियों की शिक्षा के प्रति उदासीन भाव से वे बेहद चिंतित दिख रहे थें.साथ ही उन्होंने ये भी डाटा बताया कि भारत में 5 से 9 वर्ष की आयु समूह की लड़कियों में से 53 प्रतिशत अशिक्षित है.उन्होंने शिक्षक छात्र अनुपात पर भी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि हमारे देश के 60 प्रतिशत स्कुलो में कक्षा 1 से 5 तक केवल 2 शिक्षक ही मौजूद है.स्कूलों की उपलब्धता पर भी उन्होंने सवाल उठाये .कई गांवों में आज भी स्कुल काफी दूर दूर होते हैं ,जिनकी वजह से बच्चे लगातार स्कुल नहीं जा पातें.एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात की और इशारा करते हुए उन्होंने कहा की स्कूलों में साफ सफाई का स्तर भी बहुत निम्न किस्म का होता है,खासकर लड़कियों के लिये अलग से शौचालय का निर्माण बेहद जरुरी  है.एक तो बहुत सारे स्कूलों में ऐसा नहीं है ,जहाँ है भी वो उपयोग करने लायक नहीं है.इससे लड़कियों में असुरक्षा की भावना भी उभरती है और स्कुल जाने से कतराती हैं.
                                                                                         मून मून की तरह लाखों लड़कियां पढ़ना चाहती है,कुछ बनना चाहती है.परन्तु सरकार  और समाज की इन्हीं विसंगतियों की वजह से वो पढ़ नहीं पाती हैं.हम युवा आबादी पर गर्व करते हैं.बहुतेरे का मानना है कि इन्हीं युवा आबादी की बदौलत भारत पूरे विश्व पर छा जाने का माद्दा रखता है.लेकिन अगर आज के बच्चे शिक्षित नहीं होंगे तो कल यही युवा आबादी भारत पर बोझ बन जयेगी.अपर्याप्त शिक्षा इन्हें गलत रास्ते पर ले जा सकती है.अपूर्ण शिक्षित बच्चे भविष्य में ऐसे बेरोजगार युवाओं का फ़ौज तैयार हो  सकते  हैं जिनकी कार्य क्षमता नगण्य होगी.ये भारत जैसे विकासशील से विकसित देश बनने की चाह रखने वाले देश के लिये कतई शुभ संकेत नहीं है.

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