स्वस्थ लोकतंत्र के लिये विकल्प बेहद जरूरी है.बिना विकल्प के राजनैतिक पार्टियों में जड़त्व की संभावना बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है.लोकतंत्र के लिये जड़त्व बेहद खतरनाक साबित हो सकता है.भारत में आज़ादी के बाद से ही अधिकतर समय देश में कांग्रेस का शासन रहा.एक समय ऐसा लग रहा था कि देश में एकदलीय शासन प्रणाली विकसित हो रही है .इसका परिणाम इंदिरा गाँधी के शासन काल में आपातकाल के रूप में सामने भी आया था.परन्तु बाद में धीरे धीरे कुछ क्षेत्रीय पार्टियों ने मिलकर कांग्रेस को चुनौती देना प्रारंभ किया और यहीं से भारत में स्वस्थ लोकतंत्र की शुरुवात मानी जा सकती है.लोकतंत्र तब और मजबूत हुआ जब भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ . इस पार्टी ने बहुत जल्द ही कांग्रेस के गढ़ में जा कर कांग्रेस को हराना शुरू कर दिया .भाजपा के आने के बाद ऐसा लगा कि देश में अब दो दलीय प्रणाली विकसित हो रही है.लगभग सभी क्षेत्रीय दल कांग्रेस और भाजपा को अपने फायदे के अनुसार समर्थन देने लगे. लोगो ने बड़ी ही उम्मीदों के साथ भाजपा को सत्ता तक पहुँचा तो दिया ,पर कई मोर्चो पर अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद वह अगला लोकसभा चुनाव हार गयी .शाइनिंग इण्डिया ,फील गुड जैसे भाजपा के नारे लोगों को चिढ़ाते नजर आये. देश की जनता ने भाजपा से कांग्रेस से कुछ अलग की उम्मीद की थी, मगर कई मोर्चों मोर्चों पर भाजपा का शासन कांग्रेस जैसा ही रहा.लोगों ने नई उम्मीदों के साथ फिर से कांग्रेस को दो बार मौका दिया .पर ऐसा लगा कि लगातार मिल रहे बहुमत की वजह से कांग्रेस सरकार जड़त्व प्राप्त कर रही है. भ्रष्टाचार , महंगाई , महिला सुरक्षा ,विदेश नीति जैसे गंभीर कारणों की विफलता ने यु .पी .ए की मुश्किल में जबरदस्त इजाफा किया .
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| अरविन्द केजरीवाल |
यह तो पहले से ही साफ़ था कि पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ हवा चल रही है .उस हवा को कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व ने अनाप शनाप बयानों से और हवा दे डाला .ऐसे में लोगों को मजबूत विकल्प की तलाश हमेशा रहती है.हाल में होने वाले राज्यसभा चुनावों में दिल्ली और मिजोरम को छोड़कर केवल भाजपा ही एक मजबूत ऑप्शन के तौर पर मौजूद था .इसका भाजपा ने जबरदस्त फायदा भी उठाया . मिजोरम में अगर कांग्रेस की जीत को छोड़ दिया जाये ,तो भी दिल्ली में भी भाजपा सबसे ज्यादा सीट लाने वाली पार्टी है. इसके बावजूद भी क्या कारण है कि अरविन्द केजरीवाल के आप की चर्चा हर जगह ज्यादा हो रही है.एन .टी रमा राव के बाद ऐसा शानदार राजनैतिक पदार्पण पहले कभी नहीं हुआ था. कांग्रेस और भाजपा तो इस पार्टी को इसके बनने के बाद से ही सिरे से नकार रहे थे .वहीँ कई राजनीतिक चिन्तक ,विश्लेषक की सारी भविष्यवाणी को आप के हालिया प्रदर्शन से सिरे से नकार दिया .भारतीय राजनीति के लिये कई मायनों में यह काफी शुभ संकेत है.आम आदमी पार्टी ने अपने पार्टी में आम लोगो को जगह दी,कई साधारण लोगो को टिकट दिया ,जिन्हें लोग पहले नहीं जानते थे. आम आदमी पार्टी के लोग झुग्गी-झोपडी तक आये , रिक्शे वाले ,ठेलेवाले ,मजदूर सबके पास गये ,उनमे परिवर्तन और अच्छी सरकार देने का विश्वास भरा . आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी यु.एस.पी यह है कि आम आदमी उसके साथ है.लोगों के लिये या जिसने भी इस पार्टी को सपोर्ट किया है ,उसके लिये खराब बात यह है कि इस बार यह पार्टी सरकार नहीं बना पायेगी. यह पता चलना बेहद जरूरी है कि इस पार्टी ने जितने भी वादे आम आदमी ,जनता से किये हैं,उसे कैसे निभाती है.ऐसा बहुतेरे बार हो चूका है कि सत्ता पाने से पहले नेता इमानदार रहते हैं और सत्ता पाने के बाद सम्पूर्ण चरित्र ही बदल जाता है. इसलिये इस पार्टी का लिटमस टेस्ट जल्द से जल्द हो जाये ,यह हम सभी के लिये ,आम आदमी के लिये,लोकतंत्र के लिये बेहद जरूरी है.इस बात की पूरी संभावना है कि अगर दूबारा दिल्ली विधानसभा चुनाव होते हैं तो आप सरकार बनाने की स्तिथी में पहुँच जाएगी.
लोग सच में फिलहाल कांग्रेस से मुक्ति चाहते है.और यह समय सच में कांग्रेस के लिये आत्मचिंतन करने का है. गरीबी मानसिक अवस्था है ,पांच रूपये में खाने की थाली इत्यादि बयानों ने सच में गरीब आदमी का मजाक उड़ाया है.ऐसा लगा कांग्रेस खाद्य सुरक्षा बिल लाएगी और लोग मंत्रमुग्ध होकर भ्रष्टाचार,महंगाई,रूपये का कमजोर होना इत्यादि को भूल कर कांग्रेस को वोट करेंगे. भले ही अभी लोकसभा चुनावों में कुछ समय है लेकिन हालिया विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिये खतरे की घंटी है. वहीं आप का जबरदस्त प्रदर्शन भाजपा के लिये भी कतई शुभ संकेत नहीं है.यह साफ़ है कि दिल्ली में अगर आप नहीं होती,तो भाजपा भारी बहुमत से जीतती.लेकिन ऐसा नहीं हुआ . यह इस बात की और भी इशारा करता है कि जिन राज्यों में भाजपा ने जीत दर्ज कि है,वहां कोई और मजबूत क्षेत्रीय दल नहीं होने का भाजपा जो जबरदस्त फायदा हुआ है. आप ने जनता के सामने फिलहाल साफ़ सुथरी राजनीति का विकल्प दिया है.इस पार्टी ने विश्वास दिलाया है कि राजनीति बिना जोड़ तोड़ ,बिना दबंगों ,बाहुबलियों के भी हो सकती है. पर इस एक साल पुरानी पार्टी को फिलहाल अपना सम्पूर्ण चरित्र दिखाना बांकी है.यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि राजनीति की स्वाभाविक गन्दगी से अरविन्द केजरीवाल खुद को और अपनी पार्टी को कैसे बचा पाते हैं. इतनी चर्चा करने के बाद वाम पार्टियों को नज़रअंदाज करना कई लिहाज से सही नहीं होगा. वैचारिक स्तर पर मजबूत वामपंथी पार्टियों के लिये भी ये सबक है.वामपंथियों का सबसे ज्यादा जमावरा दिल्ली में होने के बावजूद एक पार्टी के तौर पर दिल्ली में ही सुपर फ्लॉप है.ऐसा लगता है वामपंथी पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व और विश्वविद्यालय स्तर के जुझारू नेताओ में बहुत बड़ा गैप है. आम आदमी पार्टी ने जो मुकाम एक साल में पा लिया ,वह दलितों,शोषितों ,पिछड़ो की बात करने वाली कई साल पुरानी वामपंथी पार्टियों ने अब तक नहीं पाया है.यह साफ़ दिखाता है कि इनके नेता आम आदमी की बात कागजी तौर पर तो करते हैं ,मगर धरातल पर इनके नेता और आम आदमी के बीच एक बहुत बड़ा शून्य उत्पन्न हो गया है.इसी वजह से यह विचारधारा तो मजबूत स्तर पर कई जगहों पर है ,पर एक पार्टी के तौर पर यह सिकुड़ता जा रहा है. विश्व विद्यालय स्तर पर ही इस विचारधारा वाले लोगों का कई अन्य पार्टियों में विभक्त हो जाना यही दिखाता है कि ये लोग एकला चलो में विश्वास रखते हैं.जब तक संगठित होकर आम,गरीब,शोषित ,पिछड़ो के घर घर तक नहीं जाया जायेगा,तब तक किसी भी परिवर्तन की उम्मीद करना भी बईमानी है.
आम आदमी पार्टी आगे जनता की उम्मीदों पर कितना खड़ा उतर पायेगी ,या ये पार्टी भी कांग्रेस और भाजपा जैसी बन जाएगी.ऐसे कई अनगिनत सवाल हैं ,जो सभी के मन में हिलौरे मार रहे है.खैर जो भी हो,ये तो बाद की बात है . पर फिलहाल आम आदमी पार्टी के इस जबरदस्त राजनैतिक आगमन ने लगभग सभी दलों को कुछ न कुछ सबक जरुर दिया है. साथ ही राजनीति में अपना कैरियर तलाशने वालों के लिये भी नई उम्मीद की किरण जगी है .जो लोग कई कारणों से राजनीति में चाह कर भी नहीं आ पाते ,उनके मन में संदेह के बादल जरुर कुछ कम होंगे. जितने ज्यादा विकल्प होंगे ,जनता को उतना ज्यादा फायदा होगा.इसलिये विकल्पों की राजनीति हमारे लिये,देश के लिये ,लोकतंत्र के लिये बेहद ही शुभ संकेतो वाला है.
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ब्लॉग का रंग लाल है जो अनायास ही संघर्ष की याद दिला देता है। अच्छा विश्लेषण किया है आपने। उम्मीद है आप और 'आप' दोनों उम्मीदों पर खरा उतरेंगे
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